आदमी नपुंसक हो गया है.

                                 – राहुल मिश्रा
नया साल 2016 अपने साथ एक नयी उमंग तथा नया उत्साह तो लाया ही है मगर साथ ही लाया है एक नयी ज़िम्मेदारी. यह नयी ज़िम्मेदारी है कि कैसे हम स्त्रियों पर होते हुए अपराध काबू में कर सकें | मैं, राहुल मिश्रा इसी संधर्भ में एक कविता शेयर करना चाहता हूँ जो मैने तकरीबन एक साल पहले लिखी थी..|

कहने को आ गया है लो नया साल, मुबारक..
बिछा हुआ है हवस का वही पुराना जाल ,मुबारक…

कौन मुतमइन है की बदलेंगे  हालात यहाँ..
साल नया तो क्या, पुरानी वही मर्द जात यहाँ..

मसला ये नही की लिबाज कितने खुले हुए हैं…
मसला है कि आदमी के विचार कितने धुले हुए हैं…

सड़क और संसद दोनो बेबस खड़े हैं..
आध-नंगे लूटे जिस्म ज़मीन पे पड़े हैं..

हवस-ओ-हैवानियत शौक-ओ-ज़रूरत बन रही है..
दिल बहलाने की चीज़ आज औरत बन रही है….

ना भाजपा से कुछ होगा, ना कॉंग्रेस्सी कुछ करेंगे..
हौसले हैवानों के बोलो फिर क्यू ना बढ़ेंगे??

थोडा शोर होता है, फिर खामोशी चलती है उन्ही राहों से…
क़ानून भी गुज़रता है वैश्या बनकर, अपराधियों की बाहों से…

आज भेड़िए सारे-आम शहर का रुख़ करने लगे हैं…
मासूम, कोमल बच्चियों के दिल भी डरने लगे है….

घरेलू मार-पीट, शोषण, बलात्कार, मर्द कितना हिंसक हो गया है…
कितना कमजोर कितना बुझदिल आदमी सच मे नपुंसक हो गया है.

दोस्तों इस कविता के मध्यम से मैं यही गुज़ारिश करना चाहूँगा कि अगर आप लोगों का न्यू यियर रेज़ल्यूशन कुछ हो तो वो नारी सुरक्षा के लिए ही हो | क्योंकि, यत्र नार्यस्तु पूज्‍यंते, रमनते तत्र देवता: |

(Rahul Mishra is a mechanical engineer having deep interest in literature, arts, writing, poetry, psychology, sports and social-political matter. He is highly active on social media such as Facebook. He writes small articles, poems and sarcastic content  on popular social and political issues.)