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दही हांडी' का त्यौहार या 'दिखावा' का बाजार

By : अमित सिंहPunekar News's photo.

‘दही हांडी’ दोस्ती, विश्वास और आस्था के संगम से बना त्यौहार है, जो माखन चोर कन्हैया के जन्मोत्सव और उनकी बाल लीलाओ के रूप में सम्पूर्ण भारत में खास कर महाराष्ट्र में बड़े हर्षो उलास के साथ मनाया जाता रहा है । इसके पीछे की कहानी ये है की यशोदा के लल्ला प्रभु श्री कृष्ण और उनके मित्र मक्खन के बड़े प्रेमी थे , इस प्रेम पूर्ति के लिए यशोदा के लल्ला अपने घर और सम्पूर्ण गोकुलवासियों के मक्खन से भरी हांड़ी को ले लेते थे , अपने नटखट लाल की शरारतो को देखते हुए यशोदा मैया ने माखन की हांड़ी को उचाई पे छुपाने का उपाय सोचा लेकिन प्रभु कृष्ण और उनके मित्र सम्पूर्ण गोकुल में उचाई पे छतो से लटके मख्खन की हांड़ी को भी तोड़ मख्खन ले लेते थे जिसके लिए वो सारे मित्र एक दूसरे के कंधो एवं हाथो का सहारा लेके उस उचाई तक पहुँचते थे। इसी दोस्ती के प्रेम विश्वास और प्रभु कृष्ण की अटूट आस्था में आज सम्पूर्ण भारत में श्री कृष्ण की बाललीला करके उनका वंदन करने का त्यौहार मनाया जाता है।

Punekar News's photo.लेकिन आज बदलते और कहने के लिए आगे बढ़ते हुए समाज में हम यही सुनते है कि हर त्यौहार की परिभाषा बदल गयी है इसी तरह दही हांड़ी भी बस एक मनोरंजन और पोलटिकल रेस का साधन बनके रह गया है। लेकिन फिर भी मुझे लगा नहीं कही सुनी बातो से बहार निकलते है और इसलिए आज मै कई उन स्थानो पे गया जहाँ भव्य रूप से दही हांड़ी का आयोजन हुआ है परन्तु केवल निराशा ही हाथ लगी। हर तरफ केवल शोरगुल एवं चमक धमक ने अपनी जगह बना रखी है , बड़े बड़े स्पीकर जो कोशो दूर तक लोगो को खुद की आवाज न सुनने पे मजबूर कर दे , बड़े बड़े सितारे जिनकी चाँद मिनट की फीस लाखो में है उनके लिए सजा मंच इन्तेजार करता हुआ जिसपे निगाहे टिकाये हज़ारो लोग उस शोरगुल में अपने आप को अपने ही कैमरे में कैद करने में व्यस्त दिखे , कुछ शराब की बोतलों से भी ज्यादा झूमते थिरकते गिरते पड़ते लोगो का झुण्ड उन बड़े स्पीकरों के करीब इस कदर दिखा जैसे मानो सब की कानपूर में हड़ताल है , थोड़ा इधर उधर देखने के बाद मेरी नजर एक बड़े से बैनर पे पड़ी जिसपे बड़े लोगो की तस्वीरे लगी हुई थी साथ में एक बहुत बड़ी राशि जो इनाम के रूप में Punekar News's photo.रखी गयी थी इतनी बड़ी की एक क्लास १ अधिकारी की एक साल की सैलरी से भी ज्यादा , या आप बड़े आराम से उतने पैसे में २-३ परिवार को इस तरह बसा दे की वो अपना जीवन यापन बड़े आराम से कर ले, मैंने अपनी पलके झुकाई जो की बड़े देर से उस राशि पे टिक्की हुई थी तभी मेरे बगल से मेरे मित्र की आवाज आई यार सब कुछ तो दिखा लेकिन ये हांड़ी कहा है मेरा भी ध्यान हांड़ी की तरफ गया तो जो देखा मैंने तो उसे देख हसी आती और साथ में ये ख्याल यदि यशोदा मैया ने भी ये किया होता , ५०-६० फ़ीट ऊपर अपनी हांड़ी रखी होती तो ना माखन चोर कान्हा वहां पहुँच पाते और ना ये आज के समय में इतना बड़ा आस्था का मजाक बनता, ना लोगो को अपनी जान जोखिम में डाल के उस हांड़ी को फोड़ना या तोडना पड़ता।

अपने ख्याल को अपने ही अंदर समेटे हुए मै अपने दोस्तों के साथ कई और छोटे बड़े दही हांडी आयोजित स्थानो पे गया लेकिन सब जगह वही सब था कही कम तो कही ज्यादा , कही पैसे की बर्बादी तो कही पानी की , कही क्लाइमेट में प्रदूषण फैलाया जा रहा तो कही नशे में चूर लोग समाज को प्रदूषित कर रहे थे। ८-१० जगह के आज के कृष्ण गोपालो के दर्शन कर थक हार मायूसी लिए हम लोग अपने आशियाने में लौट आये। लेकिन कुछ समय बाद थोड़ी खुशी भी मिली क्योंकि बाहर कुछ अच्छा हुआ था जिसकी उम्मीद नहीं थी हमें , रात के १० बजते ही सरकारी आदेशो के अनुसार शोरगुल बंद हो गया.

Punekar News's photo.लेकिन शायद मेरे मन एक शोर हमेशा के लिए जगह बना के बैठ गया है की क्या सच में हम इतना आगे निकल गए जो हमने अपनी आस्था, विशवास, मर्यादा, रिश्ते , इन सबको मात्र एक मनोरंजन का साधन या यूँ कहु की केवल अपने आप को बड़ा दिखाने का जरिया बना लिया है. और ये सवाल या ये शोर अब केवल दही हांड़ी के त्यौहार से नही बल्कि अब तो हर हमारे त्योहारो का सोच रहा हूँ तो यही शोर मन में हो रहा है चाहे वो ईद हो , दिवाली हो , होली हो , बकरीद हो , सब तरफ तो एक ही कहानी है, जो जितना दिखवा कर सकता है कर रहा है आस्था तो कही विलुप्त ही हो गयी है.

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