अक्सर मीडीया वाले श्री अनु मलिक जी का मज़ाक उड़ाते हुए पाए जाते हैं. जब कभी भी मैं श्री अनु मलिक जी के बारे मे कुछ भी “इल्लॉजिकल” पढ़ता हूँ , मेरा दिल बैठ जाता है. कुछ “इंटेलेक्चुयल” लोग अनु जी के गीतों को मूर्खतापूर्ण बताते हैं तो कुछ कहते हैं कि उनके गीत बिना सिर-पाँव के होते हैं. मगर सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है. अनु जी के गीतों मे एक खास किस्म की गहराई है. उदाहरण स्वरूप आप वो गीत ही ले लें, “गरम चाय की प्याली हो, कोई उसको पिलाने वाली हो, चाहे गोरी हो या
Anu Malik
काली हो, सीने से लगानी वाली हो”.
अब ज़्यादातर लोग इस गीत को बचकाना कहेंगे मगर गौर करने योग्य बात है कि फिल्म इंडस्ट्री के इतिहास में एकमात्र यही वो गीत है जो रंग-निरपेक्ष है. इस गीत के द्वारा श्री अनु मलिक जी ने गोरी और काली लड़कियों को समान भाव से देखा है. जहाँ एक ओर “गोरी हैं कलाइयाँ” और “गोरे गोरे मुखड़े पे काला काला चश्मा” जैसे गीतों ने साँवली लड़कियों के कॉन्फिडेन्स लेवेल को झकझोर दिया था वहीं दूसरी ओर अनु जी के इस गीत ने साँवली लड़कियों के अंदर आशा की एक नयी किरण का संचार किया है. साँवली लड़कियों के मनोबल को इस कदर बढ़ाना भारतीय संगीत के लिए एक अभूतपूर्व कदम ही तो है. जहाँ खाप पंचायत और रूठिवादी धार्मिक संघठन महिलायों के कपड़ों और घूमने फिरने पे पाबंदी लगा देना चाहते हैं, वहीं “टन टना टन टन टन टारा, चलती है क्या नौ से बारह” गीत गाकर अनु मलिक जी ने समस्त नारी जाति को इतना साहस प्रदान किया है कि वो देर रात नौ से बारह के बीच नि-संकोच घूम फिर सकें.
अनु मलिक जी की प्रतिभा सिर्फ़ महिला-कल्याण तक ही सीमित नही रही. उन्होने समाज की परेशानियों को भी अपने मीनिंग्फुल गीतों से बयान किया है. मुंबई-दिल्ली-नोयडा जैसे शहरों मे अक्सर बड़ी बड़ी सोसाइटी मे कभी पानी नही आता तो कभी लिफ्ट खराब हो जाती है. ऐसे में बेबस जनता की आवाज़ अगर किसी ने उठाई है तो वो श्री अनु मलिक जी ने उठाई है. वो भी अपने बहू-प्रचलित गीत “उँची है बिल्डिंग, लिफ्ट तेरी बंद है” के माध्यम से.
इतना ही नहीं, यदि किसी गायक या संगीतकार ने हमारे भारतवर्ष को मॉडर्निटी अथवा आधुनिकता का सबक सिखाया है तो वो श्री अनु मलिक जी ही है. वरना जावेद अख़्तर और गुलजार जैसे कलाकारों ने उर्दू के फाड़-फाड़ शब्दों के ज़रिए म्यूज़िक फ्रीक यंग जेनरेशन की ले ही रखी थी. ईश्वर भला करे अनु जी का जिन्होने हमको हिन्दी गाने में अँग्रेज़ी का भी जायका दिया. “डू मी अ फेवर , लेट्स प्ले होली” जैसे मधुर गीत अगर अनु जी नहीं देते तो हमारी यंग जेनरेशन आज भी “रंग बरसे” से ही काम चला रही होती.
भारतीय संगीत में वेस्टर्न म्यूज़िक का तड़का लगाने के बाद भी अनु जी कि देश-भक्ति में कोई कमी नही आई. वे आज भी ज़मीन से जुड़े हुए महात्मा हैं जो अपनी ज़मीन और अपने मुल्क को सर्वोपरि मानते है. यकीन ना आए तो उनका स्वदेश प्रेम से भरा क्रांतिकारी गीत सुन लीजिए जिसके बोल इस प्रकार हैं, “ईस्ट यो वेस्ट, इंडिया इस द बेस्ट”.
इसीलिए मेरा आप सभी से अनुरोध है कि अनु जी की प्रतिभा को कम ना आँके. वे ही एकमात्र भारतीय संगीतकार हैं जो ग्रेमी अवॉर्ड के साथ साथ ऑस्कर भी डिज़र्व करते हैं. संगीत के क्षेत्र में उनके अतुल्य योगदान को देखते हुए कल को भारत सरकार उन्हे “भारत-रत्न” दे दे तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. हालाँकि उनको भारत रत्न तो उसी दिन मिल जाना चाहिए था जब वो इस धरती पे अवतरित हुए.
जय जय अनु..जय जय मलिक !!!!!!!!
Rahul Mishra
(Rahul Mishra is a mechanical engineer having deep interest in literature, arts, writing, poetry, psychology, sports and social -political matter. He is highly active on social media such as Facebook. He writes small articles, poems and sarcastic content on popular social and political issues.)